जीवनशैली – Satyakam Post | सत्यकाम पोस्ट https://satyakampost.com Latest News & Information Sat, 10 Oct 2026 05:34:02 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.2 https://satyakampost.com/wp-content/uploads/2023/12/Satyakam-Post-icon.png जीवनशैली – Satyakam Post | सत्यकाम पोस्ट https://satyakampost.com 32 32 थकान समझकर डिप्रेशन को तो नहीं कर रहीं नजरअंदाज https://satyakampost.com/archives/69534 Sat, 10 Oct 2026 05:34:02 +0000 https://satyakampost.com/?p=69534 प्रेग्नेंसी और मां बनना किसी भी महिला के लिए काफी खूबसूरत पड़ाव होता है। हालांकि, इस दौरान शरीर में भी कई बड़े बदलाव होते हैं। हार्मोन लेवल में बदलाव आता है, जिसके कारण शरीर और भावनाओं में भी बदलाव होते हैं।

आमतौर पर प्रेग्नेंसी में या उसके बाद लोग हेल्थ केयर पर पूरा ध्यान देते हैं, लेकिन महिला की मानसिक सेहत के बारे में काफी कम बात की जाती है। प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के बाद महिलाओं की मानसिक और भावनात्मक स्थिति पर ध्यान देना काफी जरूरी है।

घबराहट, लगातार उदासी, सोने में दिक्कत, तनाव या मां बनने की नई जिम्मेदारियों के बीच तालमेल बैठाना मेंटल हेल्थ को काफी प्रभावित करता है। इसलिए जरूरी है कि सही समय पर इनकी पहचान करना इस समस्या से बाहर निकलने में महिला की मदद कर सकता है।

किन वजहों से प्रभावित होती है मेंटल हेल्थ?
प्रेग्नेंसी एंग्जायटी- बच्चे के विकास, डिलीवरी में होने वाली मुश्किलें, मां बनने की जिम्मेदारियों को लेकर महिला के मन में डर और चिंता बनी रहती है।
एनीमिया- प्रेग्नेंसी में हीमोग्लोबिन कम होने की वजह से कमजोरी, थकान और चक्कर जैसी समस्याएं हो सकती है, जो इमोशनल हेल्थ पर भी असर डालती हैं।
प्रेग्नेंसी कॉम्प्लिकेशन- हाई ब्लड प्रेशर, प्री-एक्लेम्पसिया या जेस्टेशनल डायबिटीज जैसी स्थितियों में मेंटल स्ट्रेस भी बढ़ता है, जिसके लिए लगातार मेडिकल केयर की जरूरत होती है।
लेबर पेन का डर- डिलीवरी का दर्द, उस दौरान होने वाली समस्याएं या बच्चे के स्वास्थ्य को लेकर लगने वाला डर महिला की मेंटल हेल्थ को प्रभावित करता है।
नींद की कमी- प्रेग्नेंसी में होने वाला बदलाव, बार-बार पेशाब आना और डिलीवरी के बाद को बच्चे को दूध पिलाने या उसकी देखभाल के लिए जगने के कारण नींद पूरी नहीं हो पाती। इस वजह से मेंटल स्ट्रेस बढ़ता है।
पोस्टपार्टम डिप्रेशन- बच्चे के जन्म के बाद कई महिलाएं पोस्टपार्टम डिप्रेशन का शिकार होती है। डिलीवरी के बाद लगातार उदासी, रोने का मन करना, चिड़चिड़ापन, बच्चे से अटैचमेंट महसूस न होना या निराशा जैसी भावनाओं को थकान समझकर अनदेखा नहीं करना चाहिए।
पोस्टपार्टम एंग्जायटी- बच्चे के स्वास्थ्य को लेकर हमेशा डर या चिंता बनी रहना भी मेंटल हेल्थ को प्रभावित करता है।
ब्रेस्टफीडिंग और रिकवरी- डिलीवरी के बाद शरीर में दर्द, शरीर में आए बदलाव और ब्रेस्टफीडिंग में आने वाली परेशानियां महिलाओं के तनाव को बढ़ा देती हैं।

डॉक्टर से कब संपर्क करें?
अगर प्रेग्नेंसी के दौरान या डिलीवरी के बाद महिला में ये लक्षण दिखें, तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए-

उदास रहना या एंग्जायटी
बार-बार रोना या बहुत चिड़चिड़ापन महसूस होना
रोजमर्रा के कामों में रुचि खत्म हो जाना
नींद न आना
बच्चे की या खुद की देखभाल न कर पाना

कैसे करें मदद?
प्रेग्नेंसी के दौरान और बच्चे के जन्म के बाद होने वाले रूटीन चेकअप में मेंटल हेल्थ पर भी बात होनी चाहिए। डॉक्टर महिला की फिजिकल हेल्थ के साथ-साथ मेंटल हेल्थ के बारे में भी जानकारी लें, ताकि समय रहते समस्या को पकड़ा जा सके।
प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के बाद पार्टनर और परिवार की अहम भूमिका होती है। घर के कामों और बच्चे की देखभाल में मदद करें, ताकि नई मां को आराम मिल सके। साथ ही, उनकी बातों को सुनें और समझने की कोशिश करें।
हेल्दी खाना, आराम, हल्की फिजिकल एक्टिविटी और रिलैक्सेशन तकनीकें मेंटल हेल्थ को बेहतर बनाने में मदद करती हैं।

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झुर्रियां मिटाने से लेकर इम्युनिटी बढ़ाने तक, जानिए डाइट में क्यों जरूरी है ‘ब्लूबेरी’ https://satyakampost.com/archives/69482 Thu, 08 Oct 2026 05:10:43 +0000 https://satyakampost.com/?p=69482

दिखने में भले ही ब्लूबेरी एक छोटा-सा फल हो, लेकिन जब बात सेहत की आती है, तो इसके फायदे बहुत बड़े हैं। गहरे नीले रंग की इस बेरी को यूं ही ‘सुपरफूड’ नहीं कहा जाता। जी हां, एंटीऑक्सीडेंट, फाइबर, विटामिन-सी और कई अहम मिनरल्स से भरपूर ब्लूबेरी आपके शरीर को ढेरों बीमारियों से बचाने की ताकत रखती है।

नियमित रूप से इसे अपनी डाइट में शामिल करने से शरीर न सिर्फ अंदर से मजबूत बनता है, बल्कि इसका सकारात्मक असर आपके बालों, त्वचा और दिमाग पर भी साफ नजर आता है। आइए जानते हैं कि इस छोटे से सुपरफूड को खाने से आपकी सेहत को क्या-क्या शानदार फायदे मिलते हैं।

दिमाग को बनाए कंप्यूटर जैसा तेज

ब्लूबेरी में मौजूद ताकतवर एंटीऑक्सीडेंट आपके दिमाग की कोशिकाओं को डैमेज होने से बचाते हैं। इससे न सिर्फ आपकी याददाश्त बेहतर होती है, बल्कि उम्र बढ़ने के साथ जो चीजें भूलने की समस्या होती है, उसका खतरा भी काफी हद तक कम हो जाता है।

आपके दिल का रखे खास ख्याल
दिल की सेहत के लिए यह फल किसी अचूक उपाय से कम नहीं है। ब्लूबेरी में प्रचुर मात्रा में फाइबर, पोटैशियम और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। ये सभी तत्व आपके ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखते हैं और दिल से जुड़ी बीमारियों का जोखिम घटाते हैं।

वजन घटाने वालों का बेहतरीन साथी
अगर आप अपना वजन कम करने की कोशिश कर रहे हैं, तो ब्लूबेरी आपके लिए एक शानदार विकल्प है। इसमें कैलोरी बहुत कम और फाइबर ज्यादा होता है। इसे खाने से आपका पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस होता है, जिससे आपको बार-बार भूख नहीं लगती और आप एक्स्ट्रा खाने से बच जाते हैं।

दमकती और जवां त्वचा का राज
हम सभी हमेशा जवां दिखना चाहते हैं। ब्लूबेरी में मौजूद विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट आपकी त्वचा को फ्री रेडिकल्स के नुकसान से बचाते हैं। यह चेहरे पर आने वाली झुर्रियों को कम करती है, जिससे आपकी स्किन हमेशा ग्लोइंग और जवां नजर आती है।

पाचन तंत्र को करे एकदम दुरुस्त
फाइबर की अच्छी मात्रा होने के कारण यह आपके पाचन को मजबूत बनाने में काफी मदद करती है। जिन लोगों को कब्ज की शिकायत रहती है, उनके लिए नियमित रूप से इसका सेवन बहुत राहतमंद साबित होता है।

इम्यूनिटी बढ़ाए, इन्फेक्शन भगाए
एंटीऑक्सीडेंट्स से लबरेज ब्लूबेरी में विटामिन सी और विटामिन के भी भरपूर होता है। ये पोषक तत्व आपके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को तेजी से बढ़ाते हैं और आपको कई तरह के इन्फेक्शन से सुरक्षित रखते हैं।

आंखों की थकान करे दूर
ब्लूबेरी का सेवन आंखों की रोशनी के लिए भी बहुत अच्छा माना जाता है। यह आपकी आंखों की मांसपेशियों को मजबूती देती है और लगातार काम करने या स्क्रीन देखने के कारण आंखों में होने वाली थकान को दूर करती है।

डायबिटीज के मरीजों के लिए भी फायदेमंद
मीठा होने के बावजूद ब्लूबेरी का ग्लाइसेमिक इंडेक्स काफी कम होता है। इसका मतलब है कि इसे खाने से आपके खून में अचानक शुगर का स्तर तेजी से नहीं बढ़ता। यही वजह है कि डायबिटीज के मरीज भी सीमित मात्रा में बिना किसी चिंता के इसका सेवन कर सकते हैं।

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थाली में शामिल करें बादाम-तिल समेत ये 5 चीजें, दूर होगी कैल्शियम की कमी https://satyakampost.com/archives/69455 Wed, 07 Oct 2026 05:32:15 +0000 https://satyakampost.com/?p=69455

आजकल की भागदौड़ भरी, तनावपूर्ण और व्यस्त जिंदगी में हम अक्सर अपने खान-पान को नजरअंदाज कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि कम उम्र में ही हड्डियां कमजोर होने लगती हैं। बढ़ती उम्र और खराब लाइफस्टाइल के कारण हड्डियों का कमजोर होना अब एक आम समस्या बन गई है। खास तौर पर महिलाओं में कैल्शियम की कमी बहुत जल्दी देखने को मिलती है।

हालांकि, घबराने की जरूरत नहीं है। अगर आप अपनी डेली डाइट में कुछ आसान और हेल्दी बदलाव कर लें, तो अपनी हड्डियों को लंबे समय तक फौलाद सा मजबूत रख सकते हैं। आइए जानते हैं कैल्शियम की कमी को पूरा करने के कुछ बेहद सरल तरीके।

बादाम

बादाम हड्डियों के लिए एक पावरहाउस की तरह काम करता है। इसमें कैल्शियम, प्रोटीन, फॉस्फोरस, हेल्दी फैट और मैग्नीशियम भरपूर मात्रा में पाया जाता है। सबसे खास बात यह है कि बादाम में मौजूद मैग्नीशियम शरीर में कैल्शियम को सही तरीके से सोखने में बड़ी मदद करता है।

खाने का सही तरीका: रात में 5-7 बादाम पानी में भिगो दें और सुबह छीलकर खाएं।

फायदा: इसे रोज खाने से शरीर को कैल्शियम और मैग्नीशियम दोनों मिलते हैं, जो हड्डियों की कमजोरी, जोड़ों के दर्द और दिन भर की थकान को कम करने में सहायक है।

डाइट में शामिल करें कैल्शियम के ये 5 बेहतरीन स्रोत
बादाम के अलावा भी हमारी रसोई में ऐसे कई विकल्प मौजूद हैं, जो कैल्शियम की कमी को आसानी से पूरा कर सकते हैं:

दूध और दही का नियमित सेवन: कैल्शियम की बात हो तो दूध, दही और छाछ को सबसे अच्छा स्रोत माना जाता है। रोजाना अपनी डाइट में कम से कम एक गिलास दूध या एक कटोरी दही जरूर शामिल करें।

तिल का कमाल: छोटे से दिखने वाले तिल कैल्शियम का खजाना हैं। आप इन्हें तिल के लड्डू, चटनी के रूप में या फिर अपने सलाद के ऊपर डालकर भी खा सकते हैं।

हरी पत्तेदार सब्जियां: पालक, मेथी और सरसों का साग जैसी हरी सब्जियों में भी कैल्शियम की अच्छी खासी मात्रा होती है, इन्हें अपनी थाली का हिस्सा जरूर बनाएं।

रागी: अगर आप कैल्शियम का एक सस्ता और बेहद असरदार स्रोत ढूंढ रहे हैं, तो रागी से बेहतर कुछ नहीं। आप अपनी डाइट में रागी की रोटी या इसका दलिया शामिल कर सकते हैं।

गुड़ और भुना चना: स्वाद के साथ सेहत का बेहतरीन कॉम्बो। गुड़ और भुने चने को एक साथ खाने से शरीर को कैल्शियम के साथ-साथ आयरन भी मिलता है, जो बोन हेल्थ के लिए बहुत फायदेमंद है।

धूप और एक्सरसाइज भी हैं जरूरी
सिर्फ कैल्शियम से भरपूर चीजें खाना ही काफी नहीं है, शरीर को उसे अवशोषित करने के लिए विटामिन-डी की भी सख्त जरूरत होती है। इसलिए रोजाना कम से कम 15-20 मिनट धूप में जरूर बैठें। इसके साथ ही, हड्डियों को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखने के लिए अपनी दिनचर्या में रोजाना हल्की एक्सरसाइज या वॉक जरूर शामिल करें।

हमेशा याद रखें ये 3 जरूरी टिप्स
नमक और कैफीन कम करें: बहुत ज्यादा नमक और अधिक चाय या कॉफी का सेवन शरीर में कैल्शियम की कमी को और बढ़ा सकता है, इसलिए इनसे बचें।
30 के बाद बरतें खास सावधानी: 30 साल की उम्र पार करने के बाद अपने कैल्शियम इनटेक पर विशेष ध्यान दें। महिलाओं के शरीर को कैल्शियम की ज्यादा जरूरत होती है, इसलिए उन्हें इस पर खास फोकस करना चाहिए।
एक्टिव रहें: अपने डेली रूटीन में हल्की-फुल्की फिजिकल एक्टिविटी को जगह जरूर दें।

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हार्ट अटैक हमेशा अचानक नहीं आता, शरीर पहले ही देने लगता है ये संकेत https://satyakampost.com/archives/69260 Tue, 29 Sep 2026 05:50:04 +0000 https://satyakampost.com/?p=69260 टीवी सीरियल में हार्ट अटैक बड़े ही ड्रमैटिक तरीके से दिखाया जाता है, किसी शख्स के सीने में अचानक से दर्द उठता है, वह दिल पर हाथ रखता है और गिर जाता है। हमारे दिमाग में दिल के दौरे को लेकर बनाई ऐसी छवि गलत है, क्योंकि अटैक हमेशा चुपके से आता है। यह थकान, बदहजमी और हल्के-फुल्के दर्द के रूप में आता है, जिसे हम आम समझकर अनदेखा कर देते हैं।

हार्ट अटैक के समय असल में क्या होता है?
हार्ट अटैक तब आता है जब दिल तक ब्लड फ्लो अचानक से रुक जाता है, ऐसा कोरोनरी अर्टरी में फैट यानी थक्के जमने की वजह से होता है। फिर ऑक्सीजन न मिलने के कारण हार्ट टिशू कुछ ही मिनटों में डैमेज होने लगते हैं, इसी कारण डॉक्टर हमेशा एक कहावत पर जोर देते हैं कि टाइम ही मसल है, यानी इलाज में देरी से उतना ही ज्यादा नुकसान होगा।

किताबों और टीवी सीरियल से हटकर सीने में दर्द
ज्यादातर लोग सीने में दर्द की जिस असहजता को महसूस करते हैं, वो असल तो होती है लेकिन यह मुश्किल ही कभी तेज या चुभने वाले की दर्द लगती है। इसके बजाय, मरीज दबाव, जकड़न और भारीपन की शिकायत करते हैं, जिसे अक्सर एसिडिटी समझ लिया जाता है।

यह दर्द सीने के बीच में या बाईं तरफ उठता है, जो कुछ मिनट के कम जरूर हो सकता है पर फिर से होने लगता है। ऐसे में लोग इसे एक सामान्य गैस-एसिडिटी का लक्षण समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।

हार्ट में सिर्फ बाएं हाथ में ही नहीं होता दर्द
हार्ट अटैक के ऐसे भी कई लक्षण हैं जो लोगों को चकमा दे सकते हैं, ध्यान देने वाली बात यह है कि इनका संबंध सीने के दर्द से बिल्कुल भी नहीं है। इनमें एक या दोनों हाथों में दर्द, कंधों, कमर, गर्दन और जबड़े में दर्द या फिर पेट के ऊपरी हिस्से में असहजता महसूस होना। इस भ्रम को दूर कर दें कि दिल के दौरे के लक्षणों में बाएं हाथ में ही दर्द उठता है।

इन संकेतों को भी न करें अनदेखा
कई संकेत और हैं जिन्हें अक्सर लोग अनदेखा कर देते हैं, जैसे- सीने में दर्द या उसके बिना ही सांस लेने में परेशानी, अचानक पसीना आना, उल्टी या मतली, चक्कर आना, धड़कन का अनियमित चलना और बिना वजह की थकान। पुरुषों की तुलना में महिलाओं में ये लक्षण ज्यादा दिखाई देते हैं, यही वजह है कि महिलाओं में दिल के दौरे की पहचान देरी से होती है।

खुद से पता करने की कोशिश न करें
अब आपने इन लक्षणों को जान लिया है, तो आपको लग सकता है कि हार्ट अटैक को आप शुरुआती स्तर पर पहचान सकते हैं। जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि सीने में दर्द का मतलब हार्ट अटैक ही हो। कई बार एंग्जाइटी, मांसपेशियों में तनाव, एसिडिटी, फेफड़ों की समस्या भी इसकी वजह हो सकती है। इसके लिए जरूरी है कि खुद इसका पता न लगाते हुए डॉक्टर से संपर्क किया जाए।

डॉक्टर ईसीजी और ब्लड टेस्ट की मदद से इसकी पहचान आसानी से कर सकते हैं। इस बात का ध्यान रखें कि लक्षणों पर गौर करने के बाद खुद से सवाल नहीं पूछना है, इसे एक एमर्जेंसी मानते हुए तुरंत एक्शन लें।

ऐसी स्थिति में क्या करें?
अगर आप या आपके आसपास किसी व्यक्ति को ये लक्षण दिखाई देते हैं, तो सबसे पहले एमर्जेंसी सर्विस पर कॉल करें।

खुद से गाड़ी चलाकर अस्पताल जाने से बचें, क्योंकि अगर मरीज की हालत ज्यादा बिगड़ी तो एम्बुलेंस रास्ते में स्थिति को संभाल सकती है पर आप नहीं।

ऐसी कंडीशन में एस्पिरिन का नाम लिया जाता है, लेकिन इसे एक मदद की तरह लिया जाना चाहिए; इलाज के रूप में नहीं।

अगर किसी को अचानक से सीने में दर्द उठता है और उसे एस्पिरिन से कोई एलर्जी या इसे न लेने की सलाह नहीं मिली हो, तो वो एमर्जेंसी में इसका सेवन कर सकता है।

इस बात का ध्यान रखें कि लक्षण दिखने पर सबसे एमर्जेंसी में फोन करना है, और उसके बाद ही एस्पिरिन की मदद लेनी है।

हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट एक जैसे नहीं
आपको शायद पता न हो पर हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट एक बात नहीं है। हार्ट अटैक एक सर्कुलेशन से जुड़ी परेशानी है, जिसमें अर्टरी ब्लॉक हो जाती है। वहीं, कार्डियक अरेस्ट एक इलेक्ट्रिक खराबी है, जिससे हार्ट पूरी तरह से धड़कना बंद हो जाता है और व्यक्ति भी बेहोश हो जाता है या उसे सांस लेने में परेशानी होती है। समझने वाली बात यह है कि एक स्थिति दूसरी परेशानी का कारण बन सकती है, पर दोनों ही स्थिति में उपाय अलग-अलग होते हैं। बताते चलें कि कार्डियक अरेस्ट में सीपीआर की जरूरत होती है।

हार्ट अटैक के खतरे को कम करने के लिए क्या करें?
दिल की बीमारी से जुड़े खतरे को कम किया जा सकता है। इनमें तंबाकू से परहेज करना, फिजिकली एक्टिव रहना, डाइट में सब्जियां, अनाज और दाल ज्यादा से ज्यादा लेना शामिल है। वहीं, अगर किसी व्यक्ति को ज्यादा नमक वाला पैकेट फूड खाने की आदत हो, तो उससे कोलेस्ट्रॉल, ब्लड शुगर और बीपी तीनों बढ़ने का जोखिम बना रहता है।

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स्क्रीन टाइम और खराब पोस्चर बन रहा बच्चों की रीढ़ का दुश्मन https://satyakampost.com/archives/69241 Mon, 28 Sep 2026 07:30:02 +0000 https://satyakampost.com/?p=69241 आजकल बच्चों का काफी समय स्क्रीनटाइम में व्यतीत होता है। ऐसे में फिजियोथेरेपी विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक स्क्रीन उपयोग, लंबे समय तक बैठना और बैठने की खराब मुद्रा बच्चों और किशोरों में पीठ, गर्दन और अन्य रीढ़ की समस्याओं का कारण बन सकते हैं। उन्होंने नियमित रूप से ब्रेक लेने, हिलने-ढुलने, एर्गोनोमिक के बारे में जानकारी और निवारक फिजियोथेरेपी की आवश्यकता पर जोर दिया।

डब्ल्यूपीएपी सम्मेलन में उभरती चुनौतियों पर चर्चा
भारतीय फिजियोथेरेपिस्ट्स संघ (आईएपी) के विशेषज्ञों ने यह चिंता विश्व फिजियोथेरेपी एशिया वेस्टर्न पैसिफिक (डब्ल्यूपीएपी) क्षेत्रीय सम्मेलन 2026 में व्यक्त की, जो दिल्ली के यशोभूमि में आयोजित किया गया है। इस सम्मेलन में भारत और 32 देशों के 10,000 से अधिक फिजियोथेरेपी पेशेवर और प्रतिनिधि शामिल हुए, जिन्होंने शारीरिक स्वास्थ्य, पुनर्वास और निवारक देखभाल में उभरती चुनौतियों पर चर्चा की।

सम्मेलन में जताई गई चिंता
आईएपी के अध्यक्ष और डब्ल्यूपीएपी क्षेत्रीय सम्मेलन 2026 के आयोजन के अध्यक्ष डा. संजीव के झा ने कहा कि चिंता केवल इस बात की नहीं है कि एक बच्चा स्क्रीन पर कितने घंटे बिताता है, बल्कि उस दौरान शरीर के साथ क्या होता है। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक बैठना, स्थिर मुद्राएं, कम गतिविधि और मोबाइल उपकरणों की ओर बार-बार झुकना गर्दन और पीठ पर तनाव डाल सकता है।

बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि स्क्रीन का इस्तेमाल करते समय हिलना-डुलना, सही पोस्चर का ध्यान रखना और नियमित रूप से शारीरिक गतिविधि करना भी जरूरी है। हाल के वैज्ञानिक साक्ष्यों ने भी बच्चों और किशोरों में गतिहीन व्यवहार और रीढ़ के दर्द के बीच संबंध को इंगित किया है।

हालांकि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि स्क्रीन टाइम को पीठ के दर्द का एकमात्र या सिद्ध कारण नहीं माना जाना चाहिए। गर्दन के दर्द के लिए भी यह चिंता बढ़ सकती है। एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा विश्लेषण ने बच्चों और किशोरों में गतिहीन व्यवहार व गर्दन के दर्द के बीच हल्के संबंध को पाया।

बच्चों को सिखानी होगी स्वस्थ स्क्रीन आदतें
उन्होंने कहा, हमें स्वस्थ स्क्रीन आदतें सिखाने की आवश्यकता है। ऐसे में स्थिति बदलना, नियमित गतिविधि ब्रेक लेना, उचित बैठने की व्यवस्था करना और बच्चों को शारीरिक रूप से सक्रिय रखना आश्यक है। निवारक फिजियोथेरेपी और गतिविधि शिक्षा इस दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।”

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि स्कूल और माता-पिता बच्चों को पढ़ाई और स्क्रीन सत्रों के दौरान ब्रेक लेने, उम्र के अनुसार शारीरिक गतिविधि, एर्गोनोमिक सीटिंग और बैठने की मुद्रा के प्रति जागरूकता को प्रोत्साहित करें। साथ ही गर्दन झुकाकर लंबे समय तक स्मार्टफोन के उपयोग से बचें। उन्होंने सलाह दी कि बार-बार दर्द होने या बने रहने पर शीघ्र मूल्यांकन किया जाए।

डिवाइस के ज्यादा प्रयोग का बच्चों पर पड़ रहा असर
विशेषज्ञों ने कहा कि डिवाइस का इस्तेमाल करते समय शरीर की मुद्रा (पोस्चर) भी अहम हो सकती है। पांच से 12 साल के बच्चों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि स्मार्टफोन के इस्तेमाल से सिर और गर्दन के झुकाव और सिर-गर्दन की मुद्रा (क्रैनियोसर्विकल पोस्चर) में बदलाव आता है, खासकर बैठकर इस्तेमाल करते समय।

डब्ल्यूपीएपी 2026 की आयोजन सचिव डॉ. रुचि वार्ष्णेय ने कहा, हम बच्चों की एक ऐसी पीढ़ी देख रहे हैं जो स्क्रीन में मानसिक रूप से व्यस्त रहते हुए लंबे समय तक शारीरिक रूप से स्थिर रह सकती है। इसका समाधान सिर्फ बच्चों से टेक्नोलॉजी छीनना नहीं है।

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