
महाराष्ट्र सरकार ने करीब 12 साल पुराने आदेश को पलटने का फैसला लिया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अगुवाई वाली सरकार ने 2014 के सरकारी आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें मुस्लिम समुदाय के लिए पांच फीसदी आरक्षण का प्रावधान था।
महाराष्ट्र सरकार ने सरकारी नौकरी और शैक्षणिक संस्थाओं में मुस्लिम आरक्षण को लेकर नया सरकारी संकल्प (जीआर) जारी किया है। सामाजिक न्याय विभाग की तरफ से मंगलवार देर रात जारी इस आदेश के मुताबिक अब मुस्लिम समुदाय के लोगों को पांच फीसदी आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। हालांकि, कानूनी रूप से यह आदेश करीब एक दशक से अमान्य था, लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार के आदेश पर नए सिरे से चर्चा शुरू हो गई है। मौजूदा सरकार ने 17 फरवरी को जो सरकारी संकल्प (जीआर) जारी किया है, इसके मुताबिक शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी एवं अर्ध-सरकारी नौकरियों में मुस्लिम समुदाय को 5% आरक्षण का पुराना संकल्प अब रद्द समझा जाएगा। यानी इस समुदाय से जुड़े लोग इस आधार पर आरक्षण का दावा नहीं कर सकेंगे।
क्या है मुस्लिम समुदाय को पांच फीसदी आरक्षण का मामला?
दरअसल, महाराष्ट्र सरकार ने करीब एक दशक से अधिक समय पहले (जुलाई, 2014) एक सरकारी आदेश जारी कर मुस्लिम समुदाय के लोगों को पांच फीसदी आरक्षण देने का फैसला लिया था। हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के आलोक में विगत एक दशक से अधिक समय से यह आदेश अमान्य था। पुराने सरकारी आदेश के मुताबिक मुस्लिम समुदाय के लोगों को विशेष पिछड़ा वर्ग-ए (एसबीसी-ए) श्रेणी में रखा गया था। इसके तहत सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के लाभ का दावा किया जा सकता था, लेकिन तत्कालीन सरकार के इस अध्यादेश को मुंबई उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी, जिस पर लगभग 12 साल पहले ही रोक लगा दी गई थी। 14 नवंबर 2014 को हाईकोर्ट ने अध्यादेश पर रोक लगाने का आदेश पारित किया था।
क्यों सुर्खियों में आया करीब 12 साल पुराना मामला?
महाराष्ट्र सरकार ने साल 2012 में जो अध्यादेश जारी किया था, इसे विधानमंडल से पारित कराया जाना अनिवार्य था। 23 दिसंबर, 2014 की समय सीमा तक ऐसा नहीं होने के कारण कानूनी रूप से इसकी वैधता पर सवाल खड़े हो गए थे। विधानसभा से पारित नहीं होने के कारण अध्यादेश स्वतः ही निरस्त हो गया था। बाद में इस संवेदनशील मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की गई थी। बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ की गई अपील पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने भी पांच फीसदी आरक्षण को रद्द कर दिया था। इस कारण महाराष्ट्र सरकार का फैसला अमान्य हो गया था।
फरवरी, 2026 में देर रात जारी आदेश कितना अहम?
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद, महाराष्ट्र सरकार ने बीते 12 साल में किसी भी आधिकारिक आदेश के माध्यम से मूल सरकारी आदेश को औपचारिक रूप से रद्द नहीं किया। ऐसे में 17 फरवरी को जारी सरकारी संकल्प के माध्यम से यह औपचारिकता पूरी की गई। अब मौजूदा सरकार ने अपने आदेश में साफ किया है कि पांच फीसदी आरक्षण से संबंधित सभी निर्णयों और सूचनाएं अमान्य घोषित की जा चुकी हैं। 2014 के आदेश के आधार पर कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों में 5 प्रतिशत आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकेगा। इस श्रेणी के तहत कोई नया जाति या वैधता प्रमाण पत्र भी जारी नहीं किया जाएगा।


