क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे खून का सबसे छोटा हिस्सा दिमाग की एक गंभीर बीमारी का गहरा राज खोल सकता है? दरअसल, पार्किंसंस डिजीज को लेकर स्पेन में हुए एक अध्ययन ने कुछ ऐसा ही चौंकाने वाला खुलासा किया है।
वैज्ञानिकों ने पाया है कि हमारे प्लेटलेट्स में होने वाले मॉलिक्यूलर बदलाव इस गंभीर न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी के आगे बढ़ने की पूर्व चेतावनी दे सकते हैं।
स्पेन का वह हैरान करने वाला मामला
‘मूवमेंट डिसऑर्डर्स जर्नल’ में छपी एक नई रिसर्च के मुताबिक, स्पेन के एक मरीज को बहुत कम उम्र में ही पार्किंसंस हो गया था। यह बीमारी इतनी तेजी से बढ़ी कि वह जल्द ही डिमेंशिया का शिकार हो गया। जब स्पेन के ‘जर्मन्स ट्रायस आई पुजोल रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के वैज्ञानिकों ने उसके जीनोम की गहराई से जांच की, तो उन्हें उसमें एक खास हिस्से की तीन कॉपी मिलीं।
हर बार आनुवंशिक नहीं होता पार्किंसंस
जीनोम के इस खास हिस्से में ‘एसएनसीए’ (SNCA) नाम का एक जीन पाया जाता है, जिसका काम ‘अल्फा-सिन्यूक्लिन’ प्रोटीन बनाना है। पार्किंसंस रोग में यही प्रोटीन आपस में चिपक कर गुच्छे बना लेता है। इस रिसर्च में सबसे अहम बात यह सामने आई कि मरीज के जीन में हुआ यह बदलाव ‘डी नोवो’ था। इसका सीधा मतलब है कि यह बीमारी उसे अपने माता-पिता से विरासत में नहीं मिली थी, बल्कि यह जेनेटिक बदलाव अचानक उसी के शरीर में हुआ था।
प्लेटलेट्स ने दिए सबसे साफ संकेत
वैज्ञानिकों ने समय-समय पर इस मरीज की स्थिति का गहराई से अध्ययन किया। उन्होंने 41 साल की उम्र, यानी जब बीमारी बस शुरू हुई थी और 44 साल की उम्र यानी जब मरीज को डिमेंशिया हो चुका था, इसमें उसके ‘जीन एक्सप्रेशन’ यानी जीन की सक्रियता की तुलना की। इस तुलनात्मक जांच में देखा गया कि बीमारी के बढ़ने के जो भी बदलाव थे, वे पूरे खून के मुकाबले सिर्फ प्लेटलेट्स में कहीं ज्यादा साफ और स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे।
यह नई खोज भविष्य में पार्किंसंस को इसके शुरुआती चरण में ही समझने और ट्रैक करने का एक नया रास्ता खोल सकती है।